दोस्त बने दुश्मन..
दुश्मन कब दोस्त बन जाए..और दोस्त
कब दुश्मन.. कुछ कहना आसान नहीं होता...लेकिन राजनीति में सब जायज है। साल 2015 में
कुछ ऐसा ही देखने को मिल रहा है। साल में 2013 में जो दुश्मन थे..अब वो दोस्त
है..जो दोस्त थे अब वो दुश्मन है। ऐसा क्यों ये आप भी जान जाएंगे जब आप इस लेख को
पढ़ेंगे। हम बात कर रहे है..भारत की राजनीति की। साल में 2013 में यूपीए की सरकार
थी..और अन्ना हजारे ने यूपीए सरकार के खिलाफ मोर्चा खोला था। जन लोकपाल बिल का
मुद्दा जोर शोर से उठाया था। उस समय जन लोकपाल बिल के बारें बहुत ही कम लोगों को
पता होगा..लेकिन अन्ना हजारे ने इस मुद्दे को उठाया तो सबको ये जानने की इच्छा हुई
कि..आखिर जन लोकपाल बिल क्या है। अन्ना का आंदोलन कांग्रेस को ले डूबा। तब से लेकर
अब तक कांग्रेस की साख लगातार गिरती जा रही है।
अब ऐसा ही नजारा मोदी सरकार के
खिलाफ देखने को मिल रहा है। सड़क से लेकर संसद तक हंगामा ही हंगामा है। ये हंगामा भूमि
अधिग्रहण बिल को लेकर है। भूमि अधिग्रहण बिल पर बीजेपी की सहयोगी पार्टी शिवसेना
भी राजी नहीं है। जहां एक ओर मोदी सरकार को मात देने के लिए विपक्ष पूरी तरह तैयार
है। वहीं मोदी सरकार को अपने ही कड़ी चुनौती दे रहे है। ऐसे में राज्यसभा में ये बिल
पास कराना मोदी सरकार के लिए सबब बन गया है। एक तरफ विपक्ष दूसरी तरफ अन्ना..ऊपर
से अपने लोग..सब मिलकर बिल के खिलाफ बिगुल फूक रहे है। कांग्रेस तो अन्ना हजारे के
नक्शे कदम पर चल रही है। कल तक बीजेपी और अन्ना हजारे दोस्त हुआ करते थे..लेकिन अब
दोनों के बीच दुश्मनी की मशाल जल उठी है।
राजनीति में आने की चाह सबको होती
है। किसी की राजनीति के दलदल में कमल खिलाने की कोशिश रहती है..तो कोई वाहवाही बटोरने
की कोशिश में लगा रहता है। दिल्ली विधानसभा चुनाव में केजरीवाल की पार्टी ने जीत
का परचम लहराया..तो वही केजरीवाल के गुरू अन्ना हजारे को लगा कि..केजरीवाल तो
दिल्ली का सीएम बन गया। ऐसे में उनकी वाहवाही कम न हो जाए..तो मोदी सरकार के खिलाफ
मैदान में कूद पड़े..लेकिन हमें ये समझ नहीं आता कि कि अन्ना को जरूरत क्या थी
आंदोलन करने की। पहले चेतावनी देते है..वहीं जंतर मंतर पर मोदी सरकार के खिलाफ 2
दिन का धरना..उसके बाद पदयात्रा..अन्ना ये सब क्यों कर रहे है.. ये बड़ा सवाल है।
समाजसेवी अन्ना हजारे की ईमानदारी
पर सवाल उठाना सहीं नहीं। अन्ना की जगह चाहें कोई भी व्यक्ति क्यों न हों। हमारी
राय में किसी भी व्यक्ति की नीयत पर शक करना..सवाल उठाना गलत होगा..लेकिन जब बात
राजनीति की आती है..तो इसके अलग-अलग मायने निकाले जाते है। ऐसा ही अन्ना के साथ
है..क्योंकि जिस तरह से अन्ना ने कूच किया है..वो ऐसे सवालों को हवा दे रहा है। आखिर
केजरीवाल के सीएम बनते ही अन्ना को वाहवाही बटोरने की इतनी जल्दबाजी क्यों हो रही
है..कहते है न जब चेला गुरू से आगे निकल जाए तो गुरू को झटका तो लगेगा ही..और अपनी
चमक को बरकरार रखने के लिए गुरू कोई न कोई हथकंडा तो अपनाएगा ही..और ये ही काम अब
अन्ना हजारे कर रहे है..तो इसमें गलत क्या है।
भूमि अधिग्रहण बिल..जिस पर हर कोई अपनी
सियासत की रोटी सेकने में लगा है..लेकिन बात किसानों के हक की है। क्या भूमि
अधिग्रहण बिल से किसानों का भला हो पाएगा। ये बड़ा सवाल है..मोदी सरकार ने भूमि
अधिग्रहण बिल को लोकसभा में तो आसानी से पास करा लिया..क्या राज्यसभा में भी ऐसा
चमत्कार हो पाएगा..लेकिन राज्यसभा में भूमि अधिग्रहण बिल को पास कराना कड़ी चुनौती
होगी।
दुश्मन कब दोस्त बन जाए..और दोस्त
कब दुश्मन.. कुछ कहना आसान नहीं होता...लेकिन राजनीति में सब जायज है। साल 2015 में
कुछ ऐसा ही देखने को मिल रहा है। साल में 2013 में जो दुश्मन थे..अब वो दोस्त
है..जो दोस्त थे अब वो दुश्मन है। ऐसा क्यों ये आप भी जान जाएंगे जब आप इस लेख को
पढ़ेंगे। हम बात कर रहे है..भारत की राजनीति की। साल में 2013 में यूपीए की सरकार
थी..और अन्ना हजारे ने यूपीए सरकार के खिलाफ मोर्चा खोला था। जन लोकपाल बिल का
मुद्दा जोर शोर से उठाया था। उस समय जन लोकपाल बिल के बारें बहुत ही कम लोगों को
पता होगा..लेकिन अन्ना हजारे ने इस मुद्दे को उठाया तो सबको ये जानने की इच्छा हुई
कि..आखिर जन लोकपाल बिल क्या है। अन्ना का आंदोलन कांग्रेस को ले डूबा। तब से लेकर
अब तक कांग्रेस की साख लगातार गिरती जा रही है।अब ऐसा ही नजारा मोदी सरकार के खिलाफ देखने को मिल रहा है। सड़क से लेकर संसद तक हंगामा ही हंगामा है। ये हंगामा भूमि अधिग्रहण बिल को लेकर है। भूमि अधिग्रहण बिल पर बीजेपी की सहयोगी पार्टी शिवसेना भी राजी नहीं है। जहां एक ओर मोदी सरकार को मात देने के लिए विपक्ष पूरी तरह तैयार है। वहीं मोदी सरकार को अपने ही कड़ी चुनौती दे रहे है। ऐसे में राज्यसभा में ये बिल पास कराना मोदी सरकार के लिए सबब बन गया है। एक तरफ विपक्ष दूसरी तरफ अन्ना..ऊपर से अपने लोग..सब मिलकर बिल के खिलाफ बिगुल फूक रहे है। कांग्रेस तो अन्ना हजारे के नक्शे कदम पर चल रही है। कल तक बीजेपी और अन्ना हजारे दोस्त हुआ करते थे..लेकिन अब दोनों के बीच दुश्मनी की मशाल जल उठी है।
राजनीति में आने की चाह सबको होती है। किसी की राजनीति के दलदल में कमल खिलाने की कोशिश रहती है..तो कोई वाहवाही बटोरने की कोशिश में लगा रहता है। दिल्ली विधानसभा चुनाव में केजरीवाल की पार्टी ने जीत का परचम लहराया..तो वही केजरीवाल के गुरू अन्ना हजारे को लगा कि..केजरीवाल तो दिल्ली का सीएम बन गया। ऐसे में उनकी वाहवाही कम न हो जाए..तो मोदी सरकार के खिलाफ मैदान में कूद पड़े..लेकिन हमें ये समझ नहीं आता कि कि अन्ना को जरूरत क्या थी आंदोलन करने की। पहले चेतावनी देते है..वहीं जंतर मंतर पर मोदी सरकार के खिलाफ 2 दिन का धरना..उसके बाद पदयात्रा..अन्ना ये सब क्यों कर रहे है.. ये बड़ा सवाल है।
समाजसेवी अन्ना हजारे की ईमानदारी पर सवाल उठाना सहीं नहीं। अन्ना की जगह चाहें कोई भी व्यक्ति क्यों न हों। हमारी राय में किसी भी व्यक्ति की नीयत पर शक करना..सवाल उठाना गलत होगा..लेकिन जब बात राजनीति की आती है..तो इसके अलग-अलग मायने निकाले जाते है। ऐसा ही अन्ना के साथ है..क्योंकि जिस तरह से अन्ना ने कूच किया है..वो ऐसे सवालों को हवा दे रहा है। आखिर केजरीवाल के सीएम बनते ही अन्ना को वाहवाही बटोरने की इतनी जल्दबाजी क्यों हो रही है..कहते है न जब चेला गुरू से आगे निकल जाए तो गुरू को झटका तो लगेगा ही..और अपनी चमक को बरकरार रखने के लिए गुरू कोई न कोई हथकंडा तो अपनाएगा ही..और ये ही काम अब अन्ना हजारे कर रहे है..तो इसमें गलत क्या है।
भूमि अधिग्रहण बिल..जिस पर हर कोई अपनी सियासत की रोटी सेकने में लगा है..लेकिन बात किसानों के हक की है। क्या भूमि अधिग्रहण बिल से किसानों का भला हो पाएगा। ये बड़ा सवाल है..मोदी सरकार ने भूमि अधिग्रहण बिल को लोकसभा में तो आसानी से पास करा लिया..क्या राज्यसभा में भी ऐसा चमत्कार हो पाएगा..लेकिन राज्यसभा में भूमि अधिग्रहण बिल को पास कराना कड़ी चुनौती होगी।
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