Gumnaam.......
क्या सोचा था ? और क्या हो गया ? बस ! एक पल में सब कुछ... वीरान हो गया। कुछ अनसुनी , अनकही और अनजानी-सी आवाज़े कानों में अक्सर गूंजती रही... न जाने क्या कहना चाहती है। न जाने क्या बात छुपी है। इस फिज़ा में... जो अक्सर मुझे बुलाती रही है। मंज़िल की तलाश में... गुमनाम राह पर निकल पड़ी जिसकी दूर-दूर तक.... कोई आस नही थी लेकिन सुनसान राह पर खड़ी रही। जैसे वो राह... मेरा रास्ता तक रही हो। न जाने क्या बात छुपी है। इस फिज़ा में... जो अक्सर मुझे बुलाती रही है। एक आस दिल में रही। होंठों पर सिर्फ फारियाद रही। अपना सबकुछ खो गया । उस राह में... आँखों से अश्क तो बहे... लेकिन वो भी बेवफ़ा हो चले। न जाने क्या बात छुपी है। इस फिज़ा में... जो अक्सर मुझे बुलाती रही है। एक सवाल जो मुझे जाने किस में सोच में डूबो रहा है। जो चाहकर भी मुझसे … कुछ कह नही पा रहा है। मेर...