खौफ़नाक मंज़र
क्या गुज़री है ? मुझपर किसी को अहसास न होगा। मेरे दर्द से किसी को नुकसान न होगा। मैं तो चली गई... इस बेरहम दुनिया को छोड़कर। न जाने इसके बाद क्या होगा।। चिल्लाती रही, दर्द से तड़पती रही... लेकिन मेरी आवाज़... किसी के कानो तक न पहुंची। हंसती-खेलती ज़िंदगी... पल में वीरान हो गई। क्या गुज़री है ? मुझपर... किसी को अहसास न होगा। मेरे दर्द से किसी को... नुकसान न होगा।। सियासत का दौर चलता रहा। मेरे गुनाहगार मौज करते रहे। मेरी ज़िंदगी... हरपल खुद से लड़ती रही। क्या कसूर था ? मेरा... जो मुझे इतनी बड़ी सज़ा मिली। मेरे बलात्कार को... सियासी मुद्दा बनाया।। क्या गुज़री है ? मुझपर... किसी को अहसास न होगा। मेरे दर्द से किसी को... नुकसान न होगा।। आज मेरी आवाज़ को... मुकाम तो मिल गया। शुक्रगुजार हूँ। मैं उनकी जो मेरे लिए लड़ रहे है... इंसाफ मांग रहे है। क्या पता ... कल क्या होगा ? कोई मुझे याद भी करेगा। या नहीं... लेकिन जो मेरे साथ हुआ। वो किसी के साथ ...