यादों के सफर में ‘हमसफर’
तेरी यादों का भंवर न तो जीने देता है, और न मरने... अगर गलती से खामोशी छा भी जाए, तो कानों में तेरी यादें चुपके से कहती है। तू उदास क्यों है ? मैं तो तेरे आस-पास हूं, फिर क्यों खामोश है ? फिर क्या, ये हसीं यादें.. ‘ खामोशी को खुशियों ’ में बदल देती है और यादों के गहरें सागर में, फिर डूब जाते है।। तेरी यादों का भंवर न तो जीने देता है, और न मरने... तुम्हारा पास न होकर भी पास होना खुद में एक अलग अहसास है। वो अहसास जिसकी खुशबू, मेरे रोम-रोम में समा चुकी है। जिसकी कैद अब मुझे अच्छी लगती है जानती हूं, यह दिवानगी... या तो हमें ‘ आबाद करेगी या फिर बर्बाद ’ । लेकिन तुम हर डगर पर साथ हो, यह किसी अनमोल लम्हें से कम नहीं। तेरी यादों का भंवर न तो जीने देता है, और न मरने... जब कभी किस्से तुम्हारे होते है। तो दिल हंसता भी है और रोता भी फिर सोचती हूं, यादें मुझे कैद से आज़ाद करें !! फिर खामोशी घेरती है तो... यह यादें चुपके आती है, और कहती है, मेरे होते हुए तू उदास क्यों है, तेरा और मेरा साथ तो जन्मों का है...