ये कैसी तुलना..
ज़िन्दगी तो अपने दम पर ही जी जाती है..दूसरो के कन्धों पर तो सिर्फ जनाज़े उठाये जाते हैं। क्या देश के प्रति मर मिटने का ज़ज्बा कन्हैया में है ?.. क्या वो हौसला कन्हैया में है ?.. क्या वो आत्मविश्वास कन्हैया में जो फांसी के फंदे पर भारत माता की जय बोलकर हंसते हंसते प्राण न्यौछावर कर दें ?.. शायद जवाब होगा नहीं...क्योंकि जिस जेएनयू में भारत की बर्बादी के नारे लग रहे थे। उसी भारत को आजाद कराने के लिए भगत सिंह ने अपनी जिंदगी दांव पर लगा दी। छोटी सी उम्र में देश के प्रति मर मिटने का वो ख्याब आज शायद ही किसी के अंदर हो...सीमा पर जवान भी देश की रक्षा करने के लिए तैनात रहते है..तो उनके रोम रोम में भी भारत माता की जय गूंजती है। एक तरफ के वीर जवान..और दूसरी तरफ देश का ऐसा भविष्य जो भारत की बर्बादी के नारे लगा रहे है। देश की प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय जेएनयू में भारत की बर्बादी के नारे लगे..आतंकी अफज़ल गुरू को शहीद का दर्जा दिया गया। पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगे..उस वक्त कन्हैया कहां था..और सूत्रों के मुताबिक जब अफज़ल गुरू की बरसी पर जो कार्यक्रम रखा गया था..जब उस कार्यक्रम को रद्द किय...