AAP की अंदरूनी कलह

क्या आम लोगों से बनी पार्टी ऐसी होती है। खुद को गरीबों का मसीहा कहने वालों को ऐसे शब्द शोभा देते है। चाहें बात कोई भी..मामला कुछ भी क्यों न हो..लेकिन ऐसी वाणी दिल्ली के सीएम के मुहं से सुनना बिल्कुल अच्छा नहीं लगता है। आम आदमी पार्टी में उठी कलह की चिंगारी अब आर-पार की लड़ाई में तबदील चुकी है..आप के संयोजक और दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल ने 28 मार्च को आप की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक की..बैठक में मर्यादा की सारी सीमाएं लांघ दी गई..बैठक में मारपीट हुई..साथ ही अपशब्द कहे गए।


सीएम केजरीवाल ने अपना भाषण दिल्ली जीत से शुरू किया..लेकिन प्रशांत और योगेंद्र पर भाषण खत्म हुआ। केजरीवाल ने फिर बिना नाम लिए शांति भूषण पर जुबानी हमला किया..केजरीवाल ने कहा, किसी ने मुझे किरण बेदी, अजय माकन से भी निचले पायदान पर रखा..क्या उसे पार्टी में रहना चाहिए। इतने में भी आप विधायक खड़े हो गए..और गद्दारों को बाहर निकालो के नारे लगाने लगे। अरविंद ने बात आगे बढ़ाते हुए कहा कि मैं इनके साथ काम नहीं कर सकता इसलिए या तो मुझे या इन लोगों को चुन लें। मैं अपना इस्तीफा पार्टी के सभी पदों से देता हूं और एक मीटिंग में जाने को कहकर तुरंत निकल गए। उनके जाते ही गोपाल राय ने अध्यक्षता ग्रहण की और मनीष जी ने प्रस्ताव रखा कि योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण, आनंद कुमार और अजित झा को नेशनल काउंसिल से निकाला जाए।


बैठक में बैठे कुछ विधायकों को ये बात अच्छी नहीं लगीं..और उन्होंने कहा कि योगेंद्र, प्रशांत, आनंद, अजित झा को अपनी सफाई देने का एक मौका दिया जाए..लेकिन सफाई देने का मौका नहीं दिया गया। रविवार को नेशनल एक्जीक्यूटिव की बैठक में प्रशांत भूषण को अनुशासन कमेटी से भी बाहर का रास्ता दिखा दिया गया..और साथ ही तीन नए आंतरिक लोकपाल नियुक्त कर अब तक लोकपाल रहे एडमिरल रामदास की भी छुट्टी कर दी। योगेंद्र गुट के अजीत झा ने केजरीवाल खेमे पर एक बार फिर से तानाशाही रवैया अपनाने का आरोप लगाया है। अजित झा ने कहा कि वो कुछ भी सोचते हों, ये उनका अधिकार है लेकिन हमें अपनी समझ पर भरोसा है। उनकी समझ का भी सम्मान है। ये हिटलरशाही जैसा रवैया था। कल का फैसला पूरी तरह से अवैधानिक है


केजरीवाल का बचाव करने के लिए कुमार विश्वास मैदान में उतर आए है..कुमार विश्वास ने कहा कि जितना डेमोक्रेसी आम आदमी पार्टी में इतना कहीं और नहीं है। आम आदमी पार्टी में पिछले दस दिन से जारी घमासान शांत होने के आसार नहीं नजर आ रहे हैं क्योंकि जानकारों का मानना है कि प्रशांत और योगेंद्र गुट चुप बैठने वाले नहीं हैं..और जरूरत पड़ने पर वो अदालत की शरण में भी जा सकते हैं। अब ये देखना दिलचस्प होगा कि करीब तीन साल पुरानी पार्टी का ये झगड़ा कहां जाकर रुकता है।




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