सीमांचल का इतिहास

बिहार का सीमांचल..और इसकी कहानी भी काफी दिलचस्प है। इस कहानी के किस्से भी पुराने है। कहते है कि सीमांचल के वोटर का मन..हवा के रुख की तरह बदलता है..कितनी पार्टीयां आई..कितनी चली गई..लेकिन सीमांचल के वोटरों के मन को नहीं पढ़ पाई।बिहार की जनता का जनादेश सबके सामने है। 


बिहार विधानसभा चुनाव में सीमांचल का काफी महत्व रहा है...और यहां सभी पार्टीओं ने चुनाव प्रचार करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी...लेकिन अगर देखा जाए तो बिहार में सीमांचल अधिक मुस्लिम आबादी वाला क्षेत्र माना जाता है। यहां जनाधिकार पार्टी का काफी दबदाबा माना जाता है..लेकिन पप्पू यादव की पार्टी भी कुछ खास कमाल नहीं कर पाई..तो वहीं AIMIM  के मुखिया असदुद्दीन ओवैसी ने भी तमाम दावे किए..और सीमांचल की 24 सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला किया। महज 6 सीटों पर ही अपने उम्मीदवार उतारे..लेकिन लालू-नीतीश की जोड़ी के आगे सुस्त हो गए।


सीमांचल की इन 24 सीटों का इतिहास काफी पुराना है...और दिलचस्प भी। कहते है यह सीटें जिस भी पार्टी के पाले में जाती है..तो उसे बिहार विधानसभा चुनाव में काफी फायदा मिलता है..लेकिन यहां दिलचस्प बात ये रही कि..समय के साथ सीमांचल में वोट का रुख भी बदला। आजादी के बाद लंबे समय तक सीमांचल पर कांग्रेस कब्जा था..लेकिन 2010 हवा बदल गई और सीमांचल की 24 में से 17 सीटों पर बीजेपी-जेडीयू ने जीत दर्ज की।


सीमांचल की वर्तमान स्थिति जानने से पहले ये जनना जरूरी है कि..इलाके की राजनीतिक और भौगोलिक स्थिति कैसी रही है। वर्ष 1952 से लेकर 1967 तक सीमांचस के इलाके में कांग्रेस का ही वर्चस्व हुआ करता था। उस समय सीमांचल की 23 सीटों में से 21 पर कांग्रेस का कब्जा था..लेकिन बिहार में लालू प्रसाद के आते ही सीमांचल के मुस्लिम मतदाताओं का एक बड़ा तबका कांग्रेस का साथ छोड़ आरजेडी से जुड़ गया..लेकिन लालू का करिश्मा यहां लंबे समय तक नहीं चला।


लालू की मौजूदगी के बाद बीजेपी ने भी यहां अपनी जड़े मजबूत करनी शुरू कर दी..और इसका अंदाजा 1999 के लोकसभा चुनाव से लगाया जा सकता है..1999 में बीजेपी ने यहां की 4 सीटों पर कब्जा किया..लेकिन 2004 आते-आते बदल गया आरजेडी ने किशनगंज की सीट पर कब्जा जमा लिया। पिछले लोकसभा चुनाव में भी मोदी लहर के बाद भी सीमांचल में बीजेपी कोई करिश्मा नहीं कर पाई।


जाहिर है कि जिस तरीके से तीसरी बार फिर नीतीश सरकार बनने जा रही है..उसमें सीमांचल के वोटरों का सहयोग मिला है..लेकिन इस चुनाव में एनडीए के चेहरे के तौर पर पीएम नरेंद्र मोदी को पेश किये जाने और इस दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के स्वयं चुनाव प्रबंधन की कमान संभाले की वजह से दोनों की प्रतिष्ठा और साख पर सवाल उठने लगे है..तो वहीं नीतीश कुमार को मिलता बहुमत एनडीए के सपनों पर गहरी चोट कर गया है।

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