डायरी
कौन हूँ मैं?
क्या है मेरी पहचान?
मै खुद भी नहीं जानती हूँ।
लेकिन हरपल,
बदलती इस दुनिया के...
हर रंग में ढलना,
मेरी ज़िंदगानी है।
हर ज़िंदगी को पनाह देना,
मेरी कहानी है।
कोई मेरा साथ दे या न दे।
लेकिन अपनी मंज़िल को...
पाना ही मेरी जवानी है।
बस! एक आस में…
गुमनाम राह पर निकल पड़ती हूं।
अनजान चेहरों से...
मिलती हूं।
कोई अपना कहता है,
तो कोई पराया।
सफेद पन्नों पर।
मेरी आधी-अधूरी दास्तान है।
मेरे अंदर ना जाने...
कितनी खुशियाँ समायी हैं,
तो कितने ग़म भी छुपे हैं।
जो किसी ना किसी की...
खमोशी के लम्हे बने हैं।
बस! सोच कर खुश हो लेती हूं...
कि ये सब मेरे अपने हैं।
खुशी से फूली नहीं समाती हूं।
जब कोई मुझे अपना...
Best Friend कहता है।
लेकिन यह खुशी भी तो...
कुछ पल के लिए ही...
दस्तक देती है...
मेरी फूटी किस्मत पर!
मैं आज भी वहीं मौजूद हूँ।
जहाँ मेरा कोई अपना...
मेरा साथ छोड़ गया था।
अंधेरे में पड़ी...
याद करती हूं...
उन बीते हुए पलों को,
जब कभी इन नाज़ुक हाथों ने...
मुझे उठाया था,
अपने सीने से लगाया था।
और मेरे दामन में...
तमाम खुशियाँ भर दीं।
मुझसे भी कुछ वादे...
किए थे।
किसी ने...
लेकिन आज सोचती हूं कि...
कहां गए ?
वो कसमें और वादे।
जिनके सहारे मैं...
अपनी दुनिया बसाने चली थी।
अपनी ज़िंदगी में नये रंग...
भरने लगी थी।
बिना पंखों के आसमाँ में...
उड़ने लगी थी।
कैसे बयाँ करूँ?
मेरी ज़िंदगी के हर पन्ने पर,
किसी न किसी का दर्द,
तो किसी न किसी की कहानी..
लिखी होती है।
समय गुज़रता है तो,
मेरी ख़ामोशी ही...
मेरी ज़ुबान बन जाती है।
जिसके साये में रहना..
सबको न गवार गुज़रता है।
वो धूल! वो मुझे...
अपने आग़ोश में लेती है।
महकती हुई उसकी खुशबू,
मेरे रोम-रोम में...
महक उठती है।
फिर एक नया दिन
मेरी कहानी को बदल देता है।
एक शख़्स मुझी को मुझसे चुरा लेता है
और अपने कोमल हाथों से...
मुझपर जमी...
उस धूल को हटा देता है।
कुछ दिन तो उसके दिल में...
मेरी लिए मोहब्बत दिखती है।
लेकिन कुछ समय गुज़र जाने के बाद...
वो भी कहीं खो जाता है।
और मैं फिर से तनहा रह जाती हूँ...
मेरी दुनिया वीरान हो जाती है।
शायद यही मेरी सच्चाई है।
जो हर लम्हा मुझे सताती है।
और...यही सोचते-सोचते...
अपनी उसी दुनिया में...
लौट जाती हूं।
जहाँ से मेरी ज़िदंगी की...
शुरूआत हुई थी।




Waah 😍
ReplyDeleteबहुत खूब.
ReplyDelete..