क्या ऐसा विरोध प्रर्दशन जायज़ है ?



क्या ऐसा विरोध प्रर्दशन जायज़ है ? सवाल इसलिए क्योंकि तमिलनाडु के किसान दिल्ली के जंतर मंतर पर विरोध प्रर्दशन कर रहे है। सूखे और कर्ज के तले दबे किसानों ने केंद्र सरकार से 40 हजार करोड़ रुपये की मांग की है। जबकि केंद्र की तरफ से 1 अप्रैल को तमिलनाडु के किसानों के लिए 1712 करोड़ जबकि सूखे से निपटने के लिए कर्नाटक को 1235.52 करोड़ रुपये दिये गये हैं। उसके बाद भी विरोध प्रर्दशन जारी है। विरोध जताने का एक नया ट्रेंड सामने आया है..जो अपने साथ सवाल भी लाया है। क्या अपनी मांगों को पूरा करवाने के लिए ये नया तरीका जायज़ है। अगर जायज़ है तो फिर कोई भी सरकार से अपनी मांगे मनवाने के लिए जंतर-मंतर पर बैठ जाएगा। और ऐसे ही प्रर्दशन करेगा। आगे इस विषय पर कुछ लिखे उससे पहले इस मामले में अब क्या है। वो भी लिखना बेहद जरूरी है।


दिल्ली का जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन करने का गढ़ बन चुका है। इस बात को कोई नकार नहीं सकता है। हर कोई यहां पर आकर अपना विरोध जताता है। पहले की सरकारों के समय में भी देखने को मिला था। अब की सरकार के समय भी ऐसा ही देखने को मिला है। तमिलनाडु के किसान भी पिछले 41 दिनों से अपने दर्द की दस्तान को सुना रहे है। अपनी तरफ ध्यान खींचने के लिए दिल दहलाने वाली कोशिशें कर चुके हैं। शनिवार को तो इन किसानों ने लीक से हटकर विरोध किया। इन किसानों ने मानव मूत्र पीकर अपना विरोध जताया। यह किसान नग्न प्रदर्शन से लेकर चूहे खाने और सांप को मुंह में रखने जैसे तरीके अपना चुके हैं। वो आत्महत्या कर चुके किसानों की खोपड़ियां भी साथ लेकर आए हैं। इनका इरादा सिर्फ इतना है कि केंद्र सरकार उनकी समस्या का समाधान करे, लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात है।


लिहाजा शनिवार को वो प्लास्टिक की बोतलों में मानव मूत्र लेकर धरणास्थल पर बैठ गए और बाद में उसे भी पिया लिया। तमिलनाडु के एक किसान ने कहा कि "हमें तमिलनाडु में पीने को पानी नहीं मिल रहा है। पीएम मोदी हमारी प्यास को नजरअंदाज कर रहे हैं। इसलिए हमारे पास अपना मूत्र पीने के अलावा और कोई चारा नहीं है।" दिल्ली के जंतर-मंतर पर तामिलनाडु से आए करीब 150 किसान धरने पर बैठे हैं। शरीर पर आधा कपड़ा पहने, सन्यासियों सा भेष बनाए और हाथ में मानव खोपड़ी लिए ये किसान देश की व्यवस्था को याद दिलाना चाह रहे हैं कि किसान मर रहा है। कर्ज के बोझ तले दब रहा है। किसान नेता इयकन्नू का कहना है कि "सरकार को जल्दी से जल्दी किसानों के हित में कदम उठाना होगा अगर ऐसा नहीं हुआ किसानों का खेती करना मुश्किल हो जाएगा। जबतक सरकार उनकी मांगों पर ध्यान नहीं देगी तबतक किसान यूं ही जंतर-मंतर पर बौठे रहेंगे।"


क्या चाहते हैं किसान?
तमिलनाडु के किसान इन दिनों भयंकर सूखे का सामना कर रहे हैं। दक्षिण-पश्चिमी मानसून और पूर्वोत्तर मानसून सामान्य से 60 फीसदी बरसा है। ऐसे में कर्ज का बोझ उनकी जिंदगी को और कठिन बना रहा है। किसानों का आरोप है कि आत्महत्या के बढ़ते मामलों के बावजूद सरकार उनकी सुनवाई नहीं कर रही है। वो कर्ज माफी के साथ राहत पैकेज की भी मांग कर रहे हैं। दूसरी ओर, मद्रास हाईकोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को किसानों का कर्ज माफ करने का निर्देश दिया है।


13 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु में किसानों की आत्महत्या को लेकर राज्य सरकार को फटकार लगाई थी। कोर्ट ने माना था कि "किसानों की हालत वाकई बेहद चिंताजनक है। अदालत के मुताबिक ऐसे स्थितियों में सरकार की जिम्मेदारी है कि वह अपने नागरिकों का ख्याल रखे।" कोर्ट ने राज्य सरकार को नोटिस जारी कर दो हफ्ते के भीतर जवाब मांगा है। दिल्ली के जंतर-मंतर पर किसानों के समर्थन में कई नेता और दक्षिण भारतीय सिनेमा के सितारे पहुंचे हैं। राहुल गांधी के अलावा मणिशंकर अय्यर और डीएमके सांसद कनिमोझी किसानों से मिल चुकी हैं। भारतीय किसान यूनियन ने भी इस आंदोलन के समर्थन का ऐलान किया है।


राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर आरोप लगाते है कि मोदी तमिलनाडु के सूखा प्रभावित किसानों का अपमान कर रहे हैं। राहुल ने कहा कि "पीएम उद्योगपतियों की कई मांगे मान चुके हैं। उनके कर्जे माफ कर चुके हैं लेकिन किसानों के राहत पैकेज को वो मान नहीं रहे हैं।" तमिलनाडु के किसानों की कर्जमाफी का मुद्दा संसद में भी गूंज चुका है। केन्द्रीय मंत्री निर्मला सीतारमण ने राज्यसभा में सदस्यों को बताया कि सरकार किसानों की समस्याओं को लेकर गंभीर है, और इस संबंध में जल्द कुछ फैसला लेगी। इसके बाद केन्द्र सरकार ने 1 अप्रैल को फंड जारी किया है। तमिलनाडु के किसानों के लिए 1712.10 करोड़ रुपये जबकि सूखे से निपटने के लिए कर्नाटक को 1235.52 करोड़ रुपये दिये गये हैं। उसके बाद भी विरोध प्रर्दशन जारी है।



अब सवाल उठता है कि जब सरकार की तरफ से किसानों को मदद मिल चुकी है..तो फिर ऐसा विरोध क्यों। क्या अब अपनी मांगों को मनवाने के लिए किसान मानव मूत्र पीने के बाद मल खाने को तैयार है। क्या ऐसा विरोध जायज़ है। किसानों का ऐसा विरोध करना क्या नाजायज़ नहीं लगता है। अगर इस तरह के विरोध को सही ठहराया जाएगा तो फिर आने वाले समय में हर कोई इसी तरह का विरोध प्रर्दशन करेगा..अपनी मांगों को पूरा करवाएगा। अगर इसके दूसरे पहलू पर नजर डाले तो इन किसानों के लिए राज्य सरकार क्या कर रही है। अगर वो तमिलनाडु के किसान केंद्र सरकार को अपनी व्यथा को सुनाने के लिए हजारों मील से दिल्ली आए है। तो कुछ न कुछ तो राज्य सरकार की तरफ से लापरवाही होगी।


इन किसानों की मदद करना राज्य सरकार का मूल कार्य है मगर केन्द्रीय कृषि मंत्री को यह सोचना होगा कि राज्य सरकार क्यों उपेक्षापूर्ण व्यवहार कर रही है? तमिलनाडु के किसान अपनी मांगों की तरफ ध्यान आकृष्ट कराने के लिए उन्होंने लीक से हट कर आन्दोलन के रास्ते क्यों अपनाएं हैं। ये नंग शरीर खोपडिय़ां रख कर आन्दोलन कर रहे हैं और सरकार को सन्देश दे रहे हैं कि सूखा पडऩे की वजह से सैकड़ों किसान आत्महत्या कर चुके हैं। यह स्वयं में विस्मयकारी है। क्या राज्य सरकार ने किसानों की मांगों को सुना है। अगर सुना है तो अब तक इन किसानों को आश्वासन क्यों नहीं दिया गया। किसानों की मदद क्यों नहीं गई। लेकिन जिस तरीके से दिल्ली के जंतर मंतर पर किसानों का विरोध प्रर्दशन देखने को मिल रहा है। वो सवाल खड़े करता है। अगर तमिलनाडु के किसानो के विरोध प्रर्दशन के आगे केंद्र सरकार झुक जाती है तो बुदेंलखंड और विदर्भ के किसानों का दर्द कब सुना जाएगा। क्योंकि इन किसानों की हालत तो और भी ज्यादा बुरी है।




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